Thursday, 28 April 2016

अपनों के हाथ बिकती लडकियाँ

इसे मानव तस्करी, महिला तस्करी या तथाकथित "विवाह" का नाम भले ही दे दिया जाए लेकिन उन औरतों की पीड़ा को भला कौन समझ सकेगा जो अपने ही माता-पिता, चाचा, मामा आदि निकट संबंधियों के द्वारा "विवाह" के नाम पर बेची जा रही हैं। इस प्रकार के अपराध कुछ समय पहले तक बिहार, पश्चिम बंगाल तथा उत्तर प्रदेश के सीमांत क्षेत्रों में ही प्रकाश में आते थे लेकिन अब इस अपराध ने अपने पांव इतने पसार लिए हैं कि इसे मध्य प्रदेश के गांवों में भी घटित होते देखा जा सकता है। इस अपराध का रूप "विवाह" का है ताकि इसे सामाजिक मान्यताओं एवं कानूनी अड़चनों को पार करने में कोई परेशानी न हो।
मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड में भी उड़ीसा तथा आदिवासी अंचलों से अनेक लड़कियों को विवाह करके लाया जाना ध्यान दिए जाने योग्य मसला है, क्योंकि यह विवाह सामान्य विवाह नहीं है। ये उन घरों की लड़कियां हैं जिनके मां-बाप के पास इतनी सामर्थ्य नहीं है कि वे अपनी बेटी का विवाह कर सकें, ये उन परिवारों की लड़कियां हैं जहां उनके परिवारजन उनसे न केवल छुटकारा पाना चाहते हैं बल्कि छुटकारा पाने के साथ ही आर्थिक लाभ कमाना चाहते हैं।
ये गरीब लड़कियां कहीं संतान प्राप्ति के उद्देश्य से लाई जा रही हैं तो कहीं मुफ्त की नौकरानी पाने के लालच में खरीदी जा रही हैं। इनके खरीदारों पर उंगली उठाना कठिन है क्योंकि वे इन लड़कियों को ब्याह कर ला रहे हैं।
 खरीदार जानते हैं कि "ब्याह कर" लाई गईं ये लड़कियां पूरी तरह से उन्हीं की दया पर निर्भर हैं क्योंकि ये लड़कियां न तो पढ़ी-लिखी हैं और न ही इनका कोई नाते-रिश्तेदार इनकी खोज-खबर लेने वाला है। ये लड़कियां भी जानती हैं कि इन्हें ब्याहता का दर्जा भले ही दे दिया गया है लेकिन ये सिर नहीं उठा सकती हैं।
इन लड़कियों के साथ सबसे बड़ी विडंबना यह भी है कि ये अपनी बोली-भाषा के अलावा दूसरी बोली-भाषा नहीं जानती हैं अतः ये किसी अन्य व्यक्ति से संवाद स्थापित करके अपने दुख-दर्द भी नहीं बता सकती हैं। इनमें से अनेक लड़कियां ऐसी हैं जिन्होंने इससे पहले कभी किसी बस या रेल पर यात्रा नहीं की थी अतः वे घर लौटने का रास्ता भी नहीं जानती हैं। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि लौटकर जाने के लिए इनके पास कोई "अपना" नहीं है। जिन्होंने इन लड़कियों को विवाह के नाम पर अनजान रास्ते पर धकेला है वे या तो इन्हें अपनाएंगे नहीं या फिर कोई और "ग्राहक" ढूंढ़ निकालेंगे।

भारत में बुजुर्गो का इजाफा



यंग इंडिया कहे जाने वाला भारत अब धीरे धीरे बुजुगियत की तरफ बघणे लगा है | देश की कुल आबादी में बुजुर्गो की हिसेदारी लगातार बड रही है इसमें भी चिनताजनक यह है की बुजुर्ग महिलायों की दो तिहाई आबादी अपनी रोज मर्रा की जरुरतो को पूरा करना के लिए दूसरो पर निर्भर है बीता दो दशक में देश में बुजुर्ग महिलायों की संख्या पुरुषों के मुकाबले तेजी से बढ़ रही है |
सरकार की एक सर्वे रिपोर्ट बताती है की चाहे शहर हो या गाव, अब उम्र को लेकर बहुत अंतर नहीं रह गया है दोनों ही इलाको में बुजुर्गो की संख्या सामान है | 2011 की जनगणना के हिसभ से देश की कुल आबादी में बुजुर्गो की हिसेदारी 8.6 फिसद हो गयी है 2001 में यह हिस्सा 7.4 फिसद था केंद्रीय सांख्यकीके विभाग की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक बुजुर्गो की इस संख्या में महिलायों की हिस्सेदारी की कुल आबादी का नौ फिसद है तो पुरुष 8.2 फिसद है 2011 की जनगढ़ना के मुताबिक देश में 10.40 करोड़ बुजुर्घ है |
बुजुर्गो की इस आबादी में सबसे चिंताजनक बात यह है की आथिर्क लिहाज से बुजुर्घ महिलायों की स्तिथि एकदम बेहाल है | गावों में केवल 14 फिसद और शहरो में 17 फिसद बुजुर्घ महिलाये ही आथिक द्रस्टी से अपने बच्चोपैर ही निर्भर है जबकि 17.5फिसद महिलायों की निर्भरता उनके पति पर है |
केंद्र की रिपोर्ट की रफ़्तार बढ़ने के रुख में एक और चिंताजनक पहलु की तरफ ध्यान आकर्षित किया है | वर्ष 1991 तक की जनगढ़ना में हमेशा बुजुर्ग पुरुषों की संख्या में महिलायों की आपेक्षा आधिक रही है लेकिन बीते दो दशक में इस रुख में बदलाव आया है |
रिपोर्ट के मुताबिक देश में बुजुर्गो की संख्या बघणे की एक वजह औसत आयु में वृधि भी है | बेहतर चिकित्य्सा सुविधा दवायों की क्वालिटी में सुधर और म्रत्यु दर में कमी की वजह से लोगो की औसत आयु लगातार बढ़ रही है | रिपोर्ट के मुताबिक  2001 से 2011 के दशक में बुजुर्गो की आबादी 36 फिसद की रफ़्तार से बढ़ी है जबकि आबादी बढ़ने की रफ़्तार केवल आठ फिसद है |

Monday, 25 April 2016

जल है तो जीवन है....




जैसा कि हमारे राज्य सरकार का नारा है – “ जल नहीं तो कल नहीं ” | यह युक्ति हमें जल संरक्षण के लिए प्रेरित ही नहीं करती बल्कि चेतावानी भी देती है कि आने वाले समय में जल का भण्डार हमारी जरुरत को पूरा नहीं कर पायेगी , हम एक एक बूँद जल के लिए तरसेंगे | इसकी वजह है हमारे द्वारा जीवन के हर क्षेत्र में जल का दुरोपयोग , अपव्यय और हमारी अदूरदर्शिता |
इसी सन्दर्भ में विषय को सरल व सहज तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता है कि जिस तरह से ज्यामितीय वृद्धि से विश्व की जनसँख्या में उतरोत्तर वृद्धि हो रही है , आने वाली पीढ़ी के लिए जल कम पड़ जाएगा. यही नहीं जिस गति से कल कारखाने , उद्योगधंधे और शहरीकरण में दिनानुदिन उन्नति हो रही है , इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि भविष्य में जल की कितनी मात्रा की आवश्यकता होगी और हमारे पास कितने उपलब्ध होंगे. सोचनीय विषय यह भी है कि हमारे वर्तमान जल स्रोत जैसे नदी , तालाब, कूप , झरने सूखते जा रहे हैं . ग्लेशियर के भडारण में भी कमी होते जा रही है |
इस प्रकार आनेवाली मानव जाति , जीव- जंतु , पशु पक्षी और सम्पूर्ण पर्यावरण के लिए जलाभाव या जल संकट विकट समस्या का रूप धारण कर सकती है | हो सकता है कि हमारा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाय |
अतः हमसब को जल के संरक्षण के लिए एकजूट होकर खड़ा होना पड़ेगा |
संरक्षण अर्थात जल को बचाकर रखना ताकि हमारी आवश्यकता की आपूर्ति अबाध गति से अनवरत होती रहे |
जल को बचाकर रखने की दो विधियाँ हैं :
प्रत्यक्ष और दूसरा अप्रत्यक्ष
जो जल की आपूर्ति हमारे घरों , बाग बगीचे , खेत खलियानों , कल कारखानों में नित्य दिन होती है , हर हालत में उसका हमें मित्यव्यतापूर्वक उपयोग करना है | घरों में जल का उपयोग पीने , धोने नहाने , पोछने  में होता है | सभी सदस्यों को सचेष्ट रहना चाहिए कि जल का एक बूँद भी बर्बाद न हो | उसी तरह खेत खलियानो , कल कारखानों में भी जल के सदुपयोग पर हमारा ध्यान केंद्रित होना चाहिए. जल के आगमन और निगमन पर दैनिक पर्यवेक्षण और जांच होनी चाहिए | इससे जल की आपूर्ति के विभिन्न स्रोतों पर नियंत्रण होगा और सभी लोगों में जल संरक्षण की जागरूकता स्वतः जन्म लेगी |
तो हम सब मिलकर शपथ लें कि हम जल के एक बूँद को भी बर्बाद न होने देंगे और राज्य सरकार के मिशन जल नहीं तो कल नहीं को घर घर पहुंचाएंगे और जल संरक्षण के प्रति सब को जागरूक करेंगे |
 जल संचय हमारे देश में और अन्यान्य देशों में मूसलाधार वारिश होती है | नदी नाले , कूप व तालाब आदि जलमग्न हो जाते हैं | इन जलों का संचयन और भंडारण समुचित तरीके से करना चाहिए |
नदीघाटी योजना पर सरकार को ध्यान देना चाहिए | हर पंचायत में एक हज़ार आबादी वाले क्षेत्र के हिसाब से एक बड़ा तालाब खुदवाना चाहिए | जल संरक्षण तो होगा ही साथ ही साथ जल विद्युत भी पैदा होगा , सिंचाई में भी सुविधा होगी | मत्स्य पालन को प्रोत्साहन मिलेगा |
 जैसी अनाज की खेती की जाती है , ठीक उसी तरह से बड़े बड़े जल भण्डार का निर्माण किया जा सकता है ताकि जरूरत के वक्त इस जल का उपयोग किया जा सके |
 विशेषकर जहां खाद खदान हैं , वहाँ डीप खनन विधि से खनिज पदार्थ जैसे कोयला , लौह अस्क , अबरख , सोना इत्यादि निकाले जाते हैं . खानों खदानों के नीचे से पानी ऊपर तल में पम्प द्वारा भेज दिया जाता है | अधिकाँश जल बर्बाद हो जाता है | यह जल पानीय नहीं होता | इस जल को फ़िल्टर प्लानट्स के द्वारा पानीय बनाया जा सकता है | इसे धोने पोंछने में काम लाया जा सकता है |
 यह कहावत बहुत प्रचलित है कि सब कुछ सरकार के भरोसे नहीं बैठना चाहिए | समाज के लोगों का दायित्य व कर्तव्य बनता है कि वे मिलजुलकर अपने अपने पंचायतों में जल संरक्षण के विभिन्न उपायों को अपनाएँ और इस दिशा में अपने अपने क्षेत्रों को जल भंडारण एवं संचयन में आत्म निर्भर बनावें |